बागेश्वर धाम सरकार के धार प्रवास से निकलीं 5 बातें, जो बदल देंगी आपका नजरिया
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धार जिले के राजगढ़ स्थित मोहनखेड़ा जैन तीर्थ की पावन भूमि पर सोमवार को आस्था, संस्कृति और सामाजिक समरसता का एक अद्भुत संगम देखने को मिला। भजन, प्रवचन और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरे इस आयोजन ने हजारों श्रद्धालुओं को केवल भाव-विभोर ही नहीं किया, बल्कि जीवन को देखने का एक नया दृष्टिकोण भी दिया।
प्रसिद्ध कथा वाचक पं. धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के आगमन ने इस आयोजन को विशेष बना दिया। कार्यक्रम में देरी होने पर उन्होंने सहज भाव से क्षमा मांगते हुए कहा कि उनका हेलीकॉप्टर उड़ान नहीं भर सका — इस मानवीय सरलता ने उपस्थित जनसमूह का दिल जीत लिया।
लेकिन इस प्रवास का वास्तविक संदेश उस क्षण में छिपा था जब एक सनातनी संत ने जैन तीर्थंकर भगवान आदिनाथ और दादा गुरुदेव के चरणों में शीश नवाया। यह दृश्य केवल श्रद्धा नहीं, बल्कि सांप्रदायिक सौहार्द का जीवंत प्रतीक बन गया।
1️⃣ बाहर संसारी, भीतर संन्यासी — तनाव से बचने का सूत्र
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में मानसिक तनाव एक बड़ी चुनौती बन चुका है। इस संदर्भ में बाबा ने जीवन का एक गहरा मंत्र दिया:
“बाहर से भले संसारी बनो, लेकिन भीतर हमेशा संन्यासी रहो।”
यह विचार केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक सुरक्षा कवच भी है।
यदि व्यक्ति का अंतर्मन निर्लिप्त रहे, तो वह कार्यस्थल की प्रतिस्पर्धा और पारिवारिक दबावों के बीच भी संतुलित रह सकता है।
👉 विश्लेषण:
भीतर का संन्यास हमें भावनात्मक रूप से टूटने से बचाता है और निर्णय लेने की क्षमता को मजबूत बनाता है।
2️⃣ सनातन और जैन — एक ही चेतना के दो प्रवाह
इस प्रवास का सबसे मजबूत संदेश एकता का था। बाबा ने स्पष्ट कहा कि जैन परंपरा और सनातन धर्म अलग नहीं, बल्कि एक ही सांस्कृतिक महासागर की दो धाराएं हैं।
भगवान आदिनाथ के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए उन्होंने बताया कि हमारी आध्यात्मिक जड़ें हमें जोड़ती हैं, बांटती नहीं।
👉 संदेश:
जब समाज अपनी साझा विरासत को पहचानता है, तब विभाजन की ताकतें स्वतः कमजोर हो जाती हैं।
3️⃣ भक्ति में डूबना — जीवन को सार्थक बनाने का मार्ग
“पानी में डूबोगे तो मृत्यु निश्चित है, भक्ति में डूबोगे तो मोक्ष मिलेगा।”
यहां ‘डूबना’ समर्पण का प्रतीक है। संसार में डूबना व्यक्ति को अहंकार और चिंता के बोझ तले दबा देता है, जबकि भक्ति में डूबना उसे हल्का कर देता है।
👉 आध्यात्मिक अर्थ:
भक्ति केवल पूजा नहीं — यह जीवन को उद्देश्य देने की प्रक्रिया है।
4️⃣ सरलता — ईश्वर तक पहुंचने का सबसे छोटा रास्ता
धीरेंद्र शास्त्री ने कहा कि व्यक्ति को दिमाग अपने काम में लगाना चाहिए ताकि वह आगे बढ़े, लेकिन दिल भगवान में लगाना चाहिए ताकि मन शांत रहे।
जब हृदय से छल-कपट दूर हो जाता है, तभी उसमें प्रभु का वास संभव होता है।
👉 आधुनिक अर्थ:
मस्तिष्क की चतुराई करियर बनाती है,
हृदय की सरलता जीवन बनाती है।
5️⃣ एकजुट समाज ही सुरक्षित समाज
सभा में सामाजिक विषय भी प्रमुख रहे। धर्मांतरण जैसी चुनौतियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने समाज से एकजुट रहने का आह्वान किया।
सेवा को धर्म से जोड़ते हुए आगामी 15 फरवरी को आयोजित सामूहिक कन्या विवाह कार्यक्रम में सभी को भाग लेने का निमंत्रण दिया — यह संदेश था कि धर्म केवल उपदेश नहीं, बल्कि समाज सेवा भी है।
तकनीक और आस्था का भव्य संगम
मोहनखेड़ा के समीप आयोजित इस विशाल कार्यक्रम में आधुनिक व्यवस्थाओं ने आयोजन को और प्रभावशाली बना दिया:
✅ 50+ CCTV कैमरों से कड़ी सुरक्षा
✅ अंतिम पंक्ति तक दर्शन हेतु 8 विशाल LED स्क्रीन
✅ पुलिस और स्वयंसेवकों द्वारा अनुशासित व्यवस्था
✅ हजारों श्रद्धालुओं की सुचारु भागीदारी
यह आयोजन दिखाता है कि जब तकनीक और आस्था साथ चलते हैं, तो अनुभव और भी दिव्य बन जाता है।
निष्कर्ष: एक नई वैचारिक शुरुआत
बागेश्वर धाम सरकार का यह प्रवास केवल धार्मिक कार्यक्रम नहीं था — यह सांस्कृतिक एकता, मानसिक संतुलन और आध्यात्मिक जागरूकता का संदेश लेकर आया।
भगवान आदिनाथ और दादा गुरुदेव के चरणों में नमन कर उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि सत्य एक है, मार्ग अलग-अलग हो सकते हैं।
अब प्रश्न हम सबके सामने है:
👉 क्या हम अपनी व्यस्त जिंदगी के बीच उस ‘भीतर के संन्यासी’ को जीवित रख पा रहे हैं, जो हमें हर परिस्थिति में अडिग रहने की शक्ति देता है?
शायद इसी विचार में इस पूरे प्रवास की वास्तविक सफलता छिपी है।